विचार-मंथन

संसार में समाज सुखी, तो मैं भी सुखी
ऐसी समाज प्रेम की भावना निर्माण हो...

वैज्ञानिक प्रगति से मनुष्य जीवन सुखमय हो गया है। पूरी दुनिया एक क्षण में भ्रमण कर सकते हैं। घर के बाहर कदम न रखते हुए भी एक क्षण में पूरी पृथ्वी अपने नजरों की कक्षा में समाविष्ट करना मानव को साध्य हो गया है। अलग-अलग कॉम्प्युट, चलचित्रों, चैनल्स के माध्यम से विज्ञान मुट्ठी में आ गया है। सभी के आशा आकांक्षाओं की कक्षा भी बढ गई है और सभी भौतिक सुख हमें भी मिलना चाहिए इसलिए सभी रात-दिन प्रयत्न करने में लगे है और अपने पूरे जीवन का आनंद, अपने जीवन की गतिविधियों के कुछ चुने हुए आनंद के क्षण वो अपने ईष्ट, मित्र, स्वकीय परिवार के साथ मनाने की चेष्टा करता है अपने आनंद में दूसरों को भी समाविष्ट करने के लिए जन्मदिन, शादी की वर्षगांठ जैसे अनेक कार्यक्रमों का नियोजन प्रत्येक घर में होने लगा है। बहुत एक घरों में कमाने वाले हाथ बढने, कमाई बढने से ऐसे समारोहों का दर्जा भी बढता जा रहा है। पूर्व के समारोहों में घर के आंगन में मंडप, उस पर थोडी सी रोशनाई और भोजन के लिए रसोइया बोला की काम पूरा हो जाता था। अब इसके आगे जाकर मंडप, सजावट, रोशनाई, भोजन की एवं अन्य सभी कार्य कान्ट्रेक्ट देकर ऑर्डर के अनुसार होने लगे हैं। इसके आगे चलकर फाइव स्टार संस्कृति आ गई है। यह सब ऊपर-ऊपर देखने में अच्छा लगता है किन्तु यह करते हुए स्पर्धा का सामना प्रतिष्ठा का प्रश्न बन रहा है। किसी के घर के समारोह में कितना खर्च हुआ होगा तो सामने वाला दूसरा व्यक्ति उससे भी अधिक पैसा खर्च करने की होड बढ रही है। उसमें मौज, मजा, दिखावा, आडंबर, प्रदर्शन भी बेतहाशा बढा है। इतना सब करने के लिए भरपूर पैसा चाहिए फिर वह मिलाने के लिए भ्रष्टाचार, अत्याचार, दहशत, घुसखोरी ऐसे अलग-अलग मार्गों का उपयोग होने लगा है। इसी में खून खराबा, झगडा फसाद, दुर्घटना, आत्महत्या जैसे प्रकार सामने आने लगे। मनुष्य जीवन रोग, दुःख, भय, फीक्र, निद्रानाश, भ्रमिष्टपना व अरिष्टों का सामना करते मन चिंता से और शारीरिक व्याधियों से ग्रस्त हो गया है। इस तरह मनुष्य धीरे-धीरे मानसिक स्वास्थ्य गमाकर अकाल मृत्यु के रास्ते की और ढकेला जा रहा है।
अति पैसा, धन सम्पत्ति संचयन से घर के बच्चों में भी भोग विलास, चैनी बना दिया है। बच्चों को जो जब चाहिए वह तुरंत उपलब्ध करवाने से उसके मन में यह विचार पक्का होने लगा कि जो चाहिए वह मिल रहा है फिर मैं क्यों पढाई करूं? क्यों काम करूं? मुझे क्या कमी है। इस तरह हम ही अपने बच्चों को बुध्दिहीन, कर्तव्यशुन्य बनाने में लगे हैं फिर जिस युवा को कुछ काम नहीं रहता वह अपनी बुध्दि गलत प्रवृत्तियों की ओर बढाती है, नशा पानी करने लगते है फिर एक-एक दुर्गुण अपने आप पास आने लगते हैं। इस तरह युवा अपने जीवन का सर्वनाश करता है। अंत में भ्रष्ट और अनिष्ट मार्ग से आने वाला पैसा पूरे परिवार का सामाजिक जीवन खतरे में आ जाता है।
अनेक मार्गों से प्राप्त किए धन से मनुष्य अपने सात पीिढयों की व्यवस्था करता है परन्तु कमाई इस पिढी को पशुवत जीवन की और ले जाती है ओर जीवन की सुख-शांति समाप्त करने में खर्च होती है। अपने सामाजिक जीवन में पैसों से भी अधिक महत्व का मुद्दा याने मनुष्य की प्रतिष्ठा है और इसी प्रतिष्ठा के लिए अनेक प्रसंगों पर समाज में वाद-विवाद उत्पन्न होने लगते हैं। प्रतिष्ठा बनाए रखने के अनेक बार मनुष्य का पारिवारिक जीवन, सामाजिक, वैयक्तिक जीवन दुःखमय हो जाता है।
अज्ञान को आकार याने अहंकार यह बात ध्यान में लेना चाहिए। जितना अज्ञान बडा उतना अहंकार बडा। वास्तव में ज्ञान से मनुष्य में समझ आनी चाहिए। समाज में कुछ लोग पागल रहते हैं। सही में पागल होने पर मानसोपचार तज्ञ उनका पागलपन दूर कर सकते हैं। उसका उपाय संभव है, परन्तु मन से पागलों का क्या? कुछ धर्म मद आसक्त, तो कुछ को सत्ता का मद, कुछ को प्रतिष्ठा का मद, तो किसी को कीर्ति का मद, ऐसे मदों में ग्रस्त मनुष्य अपने आसपास दिखाई देते हैं। इस तरह का मद याने एक तरह से मानसिक दुर्बलता, इस मद का मूल अज्ञान है। इस दुनिया के सुख मुझे ही मिलना चाहिए। यश, कीर्ति, सत्ता, सम्पत्ति इनका अकेला में धनी समझना किसी की प्रतिष्ठा दांव पर लगाना पागलपन ही है।
ऐसे विकृत मनोविकारी वृत्ति से परावृत्त होने, विशेष प्रकार का शिक्षण एवं संस्कार बाल उमर से तो जेष्ठ व्यक्तियों को मिलना चाहिए। समाज मैं सभी सुखी, तो में सुखी, ऐसी समाज प्रेम की भावना निर्माण होना चाहिए। ऐसी धारणा निर्माण करने वाले बदल हमारी शिक्षा प्रणाली में नर्सरी कक्षा से ही होना चाहिए। नैतिक मूल्य संस्कार, पर्यावरण का विषय अभ्यासक्रम में तो रखा है, किन्तु उन पर जैसा चाहिए वैसा अमल नहीं किया जा रहा है। ऐसे में अभिभावक अपनी जिम्मेदारी से छुटकारा नहीं पा सकते। उन्हें भी बच्चों को समय देकर ज्ञान देना चाहिए।

स्वास्थ्य समस्याओं का निदान
हमारे सामने प्रश्न है, इतने रोग आज क्यों फैल रहे हैं। इतने तो पहले कभी हुआ नहीं करते थे। हमारा मानना है प्रथम कारण निष्प्राण भोजन और दुसरा शारीरिक श्रम, कसरत के प्रति लोगों का उपेक्षा भाव, मैदे से बनी चीजें, सफेद चीनी, तरह-तरह की मिठाइयाँ, अचार, मुरब्बे, नकली घी, दुध और नकली या मिलावटी पदार्थ खेतों में रासायनिक खाद का उपयोग, कीटनाशकों का छित्रडकाव। लोग गले से जल्द उतरने लायक मुलायम चीजें खाना पसंद करते हैं और शरीर की प्राकृतिक लवणों और विटामिनों की दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए फल और सब्जियों का उपयोग नहीं करते। जीर्ण रोगों का बत्रडा कारण लगातार दवा का सेवन और हमारा गलत रहन-सहन और गलत भोजन है। खाने पीने की आदतें और पध्दति भी रोगों को बत्रढा रहे हैं। रोग आसमान से टपकी हुई आफत नहीं है, यह केवल अस्वास्थ्य का लक्षण है। प्रदूषण सतत बत्रढ रहा है। प्राकृतिक चिकित्सा शक्ति के प्रति हमारा उदासीन रहना भी कारण है।
वर्तमान युग में शरीर से अधिक मानसिक बिमारियां एक बत्रडा कारण है। हम शरीर को सजाने आकर्षक बनाने में समय-धन खर्च करते हैं पर हमारी अंदर की सफाई के प्रति ध्यान नहीं देते। भौतिकवादी संस्कृति ने कई प्रलोभन, स्वार्थों के विस्तार, बुध्दि के दुरुपयोग के तरीके अहं, धृणा, गलाफाड प्रतियोगिता ऐसे ही आम कारणों से मानसिक तनाव बत्रढ रहा है। हजार से लाख, लाख से करोत्रड, करोत्रड से अरब पैसे तक उससे भौतिक सुख-सुविधाओं से सुखी रहना चाहते हैं तो थोत्रडे की कामना करें। सीमित इच्छाएं, सीमित चाहत वास्तव में एक नियामत है जो किसी स्वस्थ दिमाग और चरित्र के व्यक्ति को ही नसीब हो सकती है थोत्रडा है, थोत्रडे की जरूरत है, उसमें समाधान मानने की कला स्वस्थ रहने की कला है। परिवार में हंसी-खुशी और आनंद का वातावरण, संदेह से परे विश्वास का वातावरण मन को बत्रडा सुकून देता है। पुजापाठ-दान धर्म कथाज्ञान कर्म करने से नहीं पवित्र ग्रथों में उल्लेखित कथाओं का अनुसरण करने में अनमोल जीवन का रहस्य छिपा है। संवादहीनता से मनोविकार बत्रढते हैं, घर परिवार, समाज, देश-प्रदेश से जीवंत सम्पर्क बनाए रखें।
जिसके पास स्वास्थ्य है उसके पास सबकुछ है। संसार का सबसे बत्रडा सुख है शारीरिक स्वास्थ्य, बीमार शरीर जेल है। अच्छे स्वास्थ्य के बिना जिंदगी व्यर्थ है। चिकित्सक दवाई जरूर देता है और बीमारियों से लत्रडने में हमारी सहायता करता है, परन्तु अच्छे स्वास्थ्य के लिए हमें ही सजग होना पत्रडेगा। भारतीय जीवन पध्दति में प्राकृतिक मिट्टी, जल, अग्नि, सूर्य और वायु के यथोचित सेवन से हमारी प्राण शक्ति पृष्ट होती है। योग से शरीर मन और अंतरात्मा का लय बध्द विकास होता है। कम मेहनत में जल्दी एवं ज्यादा फल चाहते हैं और थोत्रडी सी दूरी के लिए वाहन। यहां तक की बीमारी दूर करने हम सेल्फ ट्रीटमेंट करते हैं और फिर डॉक्टरों के पास जाते हैं। शीघ्र आराम न मिलने पर डॉक्टर भी बदलते रहते हैं। डॉक्टर भी इस स्थिति का लाभ उठाकर दुकानदार बन जाता है।
जल्दी सोने एवं जल्दी उठने में मनुष्य स्वस्थ शक्तिवान और बुध्दिमान बनता है। प्रसन्नचित स्वास्थ्य निर्माण की प्रमुख सामग्री है। हमारे पास हवा पानी और सफाई जैसी औषधों का विशाल भंडार है। योगासन, खेल, कसरत, प्राणायाम और ध्यान भारतीय संस्कृति के संवाहक है। टहलने में हमारा कुछ भी खर्च नहीं होता। चरित्र, संयम, धैर्य, शांति ऐसी औषधियां जो बाजार में नहीं मिलती। अधिक पानी पीना, संतुलित आहार और कम खाना, तन-मन को स्वस्थ रखता है। धन की बचत करता है। असमय खाते रहना, भूख न लगने पर भी खाना, बार-बार खाना या एक ही बार पेट भर खाना जैसी आदतें से पेट गोडाऊन बन जाता है। कम कॅलोरी का खाना, अधिक कॅलोरी का खर्च करना स्वास्थ्य वर्धक होता है।


  नई जुनी पीढी : 

विकास के मायने क्या?         


शिष्टाचार सभ्य जीवन की प्रथम कसौटी है। नई पीढी का अपना एक पक्ष है। माता-पिता से उनकी मतभिन्नता बढते जा रही है। नयी पीढी अपने पथ पर चलने को स्वतंत्र है किन्तु क्या दव्यवहार, असभ्यता और अशिष्टता, स्वतंत्र मत और स्वतंत्र जीवन पध्दति के लिए अनिवार्य नहीं। मतभेद रखते हुए भी हम माता-पिता गुरुजन, बुजुर्गो को आदर और सम्मान तो दे ही सकते हैं। आक्रोश, उत्तेजना, उदण्डता और किए हुए उपकारों को, विस्मृत करना नवीनता के गौवर-चिन्ह नहीं बन सकते। नई पीढी में जो उदण्डता बढ रही है, वह निर्माण नहीं विनाश कर रही है। सभी क्षेत्रों में उसका भयावह रूप देखने को मिल रहा है।


नई पीढी में जो आवेग है, जो विद्रोह-भावना है, जो प्रश्नचिन्ह खडा करने की प्रवृत्ति है, जो शक्ति का उन्मेश है, वह निरर्थक है। उसे छोड देना चाहिए यह हमारा तात्पर्य नहीं। मतलब इतना ही है कि जो वर्तमान है, इसके समुचित उपयोग और विकास में पुरानी पीढी का भी योगदान है। उनके प्रति आदर और सम्मान करना अपनाही आदर और सम्मान हैं। शिष्टता, प्रत्येक व्यक्ति, वर्ग, समाज और कालका भूषण हैं। उसे समझने की कोशिश न करना मानवता का अपमान हैं।
आज पश्चिमी सभ्यता की चकाचौंध, उपभोक्तावादी ललक और भौतिकता की अंधी दौड में मनुष्य दौड रहा है। उसका सुख-चैन छीनकर तनाव बढ रहा है। कभी-कभी हम दूसरे व्यक्ति के सुख साधनों को देखकर तनाव पालते हैं। अधिक पाने से सुख नहीं बढता, वरन झंझट, कष्ट और दुःख ही बढाते हैं। कम बोलने से तनाव नहीं होता हैं। बिना सोचे बोलने से अनर्थ हो सकता हैं। तनाव रहित जीवन का एक सूत्र है कि हम किसी से कोई आशा या अपेक्षा न रखें वस्तुतः व्यक्ति का अहंकार ही सब झगडों और विवादों की जड है। सुख एवं आनंद पाने के लिए ही जगत में आए हैं, तनाव में जीना हमारी नियति नहीं होनी चाहिए।
आज विज्ञान काफी विकास करता जा रहा है, अच्छी बात है किन्तु इसका परिणाम हमारी संस्कृति पर हो रहा है। इस कारण सब होते हुए भी अशांति का माहौल निर्माण होता है। धन से अधिक अच्छे संस्कारों की आवश्यकता है। वृध्दावस्था में अपने को बदलने की आवश्यकता है। संसार के महापुरुषों में सदा ही सरलता, आडम्बरहीनता, अभिमानशून्यता और विनम्रता पायी जाती है।
नीत नई टेक्नालॉजी आ रही हैं और प्रकृति की गति में मनुष्य का हस्तक्षेप बढता जा रहा है। टेक्नालॉजी मनुष्य और मनुष्य के सम्बन्ध को प्रभावति कर रही हैं। सडकों पर मरकरी लाइट जगमगा रही है, पर मन के आंगन में अंधेरा है। नई संचार व्यवस्था ने दूर का अंतर कम कर दिया हैं, किन्तु मन का अंतर बढता जा रहा हैंष। यात्रा-तीर्थयात्रा सहज सुगम हो गई हैं किन्तु जीवन की यात्रा त्रासदीपूर्ण होते जा रही हैं। नई उपचार पध्दितयां-औषधियों से मार्केट भरा पडा है। मरीजों की संख्या बढ रही हैं, बेतहाशा बढ रही है। दवाखाना दुकान, डॉक्टर दुकानदार और मरीज ग्राहक बन गया है। शिक्षक ज्ञान नहीं दे रहा, शिक्षा बेच रहा है। वकील कानून के अंतर्गत न्याय दिलाने में कठिनाई महसूस कर रहा है, अपने पक्ष का न्याय खरीदने में दलाल बनना पड रहा है। मंदिर से लेकर मंत्रालय तक धन का बोलबाला हैं, पुज्या स्त्री से लेकर निसर्ग तक से छेडछाड की जा रही हैं। सभी का परिणाम संवेदनशीलता में लगातार ह्रास हो रहा है। नैतिकता का पतन हो रहा हैं। श्मशान के अलावा कहीं शांति नजर नहीं आती। शांति के लिए प्रवचन, यज्ञ में भी प्रदर्शन, आडम्बर बढकर एक नया व्यवसाय के रूप में सामने आ रहा है। हमारे श्रध्दा, विश्वास और आस्था को गहरी ठोस पहुंच रही हैं। समाज संगठन और जूनी पीढी के आपसी समन्वय से सद््भावना से ही संभव है। समाज संगठन और उसका नेतृत्व करने वालों से वर्तमान में कोई अपेक्षा बेमानी सिध्द हो रही हैं।

सफल कौन असफल कौन
सोच के फर्क से बनता मनुष्य का व्यक्तित्व


सफल वे लोग होते हैं जो दूसरे की सराहना करते हैं। दूसरे के प्रति अपना आभार व्यक्त कर उसे अपना बना लेते हैं और गलती पर माफ भी कर देते हैं। सफल व्यक्ति अपनी सफलता का श्रेय सभी को देते हैं और अपनी असफलता के लिए स्वयं को दोषी मानते हैं। जो रोज कुछ नया पढते हैं और आदर्श के साहित्य का अध्ययन करते हैं और नये-नये आडिया पर अपनी सोच बताते हैं और सभी को विजय के रूप में देखना चाहते हैं तथा अपने विचार और बुध्दि के जरिये अपनी बात सभी से आपस में बांटते हैं। सफल व्यक्ति स्वयं जानता है कि उसे क्या बनना है उसे पता होता है और अपनी खुशी बांटकर हमेशा लक्ष्य की ओर चलता है और स्वयं को परिवर्तन के रूप में लाता है और लगातार सिखने की कोशिश करता है। अपने प्रोजेक्ट के लिए सूची बनाने में पीछे नहीं रहता। स्वयं को सुधारने में भी अपना नजरिया इस ओर रखता है। सफलता के पीछे ऊपर दी हुई बातें पर ध्यान दिया जाए तो सफलता निश्चित है।
सफलता तो हर कोई व्यक्ति चाहता है और उसके लिए वह प्रयास भी करता है परन्तु कई कारणों से वह असफल हो जाता है। इसके पीछे मुख्य कारण यह है कि वह व्यक्ति स्वयं के अधिकार की बात करता है कर्तव्य की नहीं, के साथ दूसरों की आलोचना में लगा रहता है, जिससे वह मन में दूसरों से दुश्मनी पाल कर बैठ जाता है और सफलता का सारा श्रेय वह स्वयं को देता है। अपनी असफलता के लिए दूसरों को दोषी ठहराता है। साथ ही सारा समय व्यर्थ के रूप में बिता देता है। वह किताबों का अध्ययन करने की बात करता है परन्तु ऐसा नहीं। अपने स्वभाव के विचार के कारण उसे बदलाव करने में डर लगता है। जमीनी वास्तविकता से दूर होकर अतिउत्साहित रहता है वह यह सोचता है कि वह सबकुछ जानता है। उसकी सोच दूसरों के बारे में नकारात्मक सोच रहती है और हर चीज को वह मुनाफे की सोच रखता है और नुकसान पर भी अपनी दृष्टि रखता है। अपने मन ही मन में वह दूसरों को असफल होते देख खुश होता है। अपना ज्ञान किसी को आपस में बांटने का विचार भी उसके मन में नहीं आता। उसे यह भी पता नहीं होता कि आखिर उसको जीवन में क्या बनना है। इस तरह के व्यक्ति हमेशा गुस्सेले किस्म के होते हैं उनका कोई सही लक्ष्य नहीं होता।      एम.एम. मंत्री


नवयुवकों के भविष्य पर
जमनालाल बांगड, भीलवाडा (राज.)


माहेश्वरी समाज में चहूं तरफ आज यह सुनने को मिलता है कि समाज के होनहार एवं संभ्रान्त परिवार के नवयुवकों के समय पर संबंध नहीं हो रहे हैं और माता-पिता परिवार के बन्धु मन ही मन अपने आपको कसोटते रहते हैं। अपनी व्यथा को संकोचवश कभी खुलकर व्यक्त नहीं कर पाते हैं। परिवार में यदि लडके का सम्बन्ध नहीं हुआ तो लडकी सम्बन्ध के योग्य हो जाने पर उसका सम्बन्ध नहीं करते हैं क्योंकि आजकल आटा-साटा सम्बन्ध करने की प्रथा भी चल पडी है जिन घरों में लडकियां नहीं है उनका हाल तो और भी बद््तर है। यह समस्या दिनों दिन बढती जा रही है और सामाजिक मंच पर उसका समाधान ढूँढ पाना सहज नहीं लगता।
यह भी कटू सत्य है कि लडकों की तुलना में लडकियों की अनुपातिक लिंगानुपात दर में पिछले कुछ समय से कमी आई है। प्रदेश व राष्ट्रीय स्तर पर इसके आंकडे मीडिया के माध्यम से प्रकाशित होते रहते हैं। राष्ट्रीय एवं राज्य महिला आयोग की अध्यक्षा ने खुले रूप से इसे स्वीकार किया है। वैसे यह समस्या माहेश्वरी समाज की नहीं अपितु सवर्ण वर्ग से संबंधित सभी समाजों की है। इसे राष्ट्रीय समस्या कहा जाये तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। दिसम्बर 2012 तक के आंकडे दर्शाते हैं कि 1000 लडकों के मुकाबले लडकियों की संख्या 883 है। इस संख्या में और इजाफा ही हुआ है।
अब हम समाज के प्रति पूर्ण निष्ठा और सच्ची लगन से बच्चों के भविष्य को संवारने की दिशा में कुछ सतत प्रयास करें तो आप समाज के अच्छे कर्णधार कहलाने के लायक तो है ही अपितु सही दिशा में मोडने पर माहेश्वरी समाज के श्रेष्ठतम प्रथम श्रेणी के नागरिक कहलायेंगे।
- सबसे पहले तलाक की जो एक समस्या चल पडी है उस पर नियंत्रण पाने के लिए न्यायालय में जाने से पूर्व समाज के कुछ चुनिन्दा प्रतिष्ठित बुध्दिजीवियों की जिला स्तर पर एक कमेटी का गठन करना होगा। उसमें इस प्रकार के प्रकरणों को आपसी सद््भावना से दोनों पक्षों को समझाइश करें तो बहुत कुछ सफलता प्राप्त की जा सकती है।
- लडकों व लडकियों में अच्छे संस्कारों की तरफ उनका ध्यान केन्द्रित करना।
- उच्च कोटि की शिक्षा विशेष तौर से तकनीकी शिक्षा दिलाना।
- बच्चों में यदि कहीं से हीन भावना का प्रार्दुभाव होता है तो उसे तुरन्त रोकना।
- आधुनिक फैशन में रहने पर नियंत्रण करना।
- बच्चियों की शादी लायक उम्र होते ही शादी के सम्बन्ध तय करना।
- सर्वण एवं सभ्य समाज के साथ शादी करना। आज के माहौल को देखते हुए आप अपने बच्चों के सम्बन्ध सर्वण समाज के युवक-युवतियों के साथ स्थापित कर इसे प्रोत्साहित करें।
- गांवों के समग्र विकास की तरफ ध्यान देना। यदि शहर का कोई उद्योगपति अपना उद्योग आसपास के गांव में स्थापित करता है तो उसे शहर से भी अधिक गांव में लाभ मिलेगा क्योंकि शहर की तुलना में गांव में साधन अधिक सुलभ व सस्ते होंगे। जैसे सस्ती दर पर भूमि, लेबर, पानी, गोदाम प्रदूषण कम आदि ऐसा करने से गांवों के विकास में अच्छा योगदान माना जाएगा तथा शहरी लोगों का ध्यान गांव की तरफ मुडेगा।
- हायर एज्युकेशन सेन्टर तथा टेञफ्ीकल कॉलेज तहसील या कस्बा स्तर पर खोलना।
- ग्रामीण इलाके में रहने वाले लडके अपनी शिक्षा का उच्च स्तर अपने जीवन का लक्ष्य बना लें तो इसमें कई अतिशयोक्ति नहीं है कि उनके सम्बन्ध न हो। कूडे-कचरे में यदि हीरे मोती मिलते हैं जो सबकी नजर उस पर जाना स्वाभाविक है।
आज की यह ज्वलन्त समस्या है इस पर समाज के उच्च स्तर के मंचों पर विचार-विमर्श, मंथन चिंतन किया जाना अतिआवश्यक है। अतः अखिल भारतीय माहेश्वरी मंच पत्रिका के माध्यम से मैं यह विचार आप तक पहुंचा रहा हूं। मुझे विश्वास है कि समाज के सर्वांगीण विकास में अपनी भागीदारी निभाकर उपरोक्त बिन्दुओं की क्रियान्विती कराने में अपना सहयोग प्रदान करेंगे।


स्वस्थ महिला से, स्वस्थ समाज और देश का निर्माण
-श्यामसुंदर टावरी, अमरावती (विदर्भ)


पवित्र संकल्प हो तो क्या नहीं हो सकता। इसका उदाहरण है पोलियो, महारोग की बीमारी का देश से उच्चाटन, किसी देश की स्थिति वहां की महिलाओं के स्वास्थ्य को देखकर बताई जा सकती है प्रगतिशील राष्ट्र कहलाने के बावजूद भारत देश में कन्या भ्रूण हत्या, महिलाओं पर पारिवारिक एवं सामाजिक अत्याचार, बलात्कार की घटनाएं बढ रही हैं। असहाय एवं कमजोर तबके की महिलाओं की हालात तो और भी दयनीय हैं। गरीबी, बिमारी, स्वच्छता का अभाव, अल्प उम्र में माँ बनना, पीने के लिए स्वच्छ पानी की कमी और विपरीत जीवन जीने की स्थितियां जैसे प्रमुख कारण हैं, समस्याएं हैं। महिलाओं में अधिकार, शिक्षा में बढोतरी के बावजूद बालमृत्यु, प्रसुति के समय मृत्यु और जन्मदर का प्रमाण घटा नहीं है। शासन महिलाओं के स्वास्थ्य, सुरक्षा, विकास की कई योजनाएं बनाती हैं किन्तु वे उन तक पहुंचती नहीं यह विडंबना है।
गर्भवती, बच्चे की माँ और कन्याओं में प्रायः पीलिया, रक्त की कमी, मलेरिया और तपेदीक की बीमारी पाई जाती है। उनमें यौन सम्बन्धों से संसर्गजन्य रोग, एड्स, कैंसर जैसी बीमारियों की जानकारी तथा इलाज देरी से करने के कारण और भी स्थिति खतरनाक हो जाती है। जब पुरुष बीमार पडता है तो उसकी देखभाल महिला ही करती है, किन्तु जब महिला बिमार पडती है तब पुरुष उसकी देखभाल नहीं करता। सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर इसी तरह महिला और पुरुषों में भेदभाव किया जाता है।
सुरक्षा के सहज उपाय हैं। किसी भी तरह का व्यसन ना करें। अच्छा सशक्त अनाज खाएं, साबुत धान्य, फल, दूध का उपयोग बढाएं। किसी भी तरह की स्वास्थ्य की शिकायत के लिए अपने डॉक्टर से सम्पर्क करें। उचित समय में राहत ना मिलने पर किसी अच्छे डॉक्टर की सलाह लें। पहले बिमारी छुपाना या घरेलू ईलाज या सेल्फ ट्रीटमेंट से ठीक न होने पर डॉक्टर के पास जाना हानिकारक हो सकता है। शारीरिक श्रम करना, तनाव रहित जीवन का टाईम टेबल बनाना जीवन जीते अपने वजन पर ध्यान रखना, बच्चे को माँ का दूध पिलाना जैसे सहज सरल उपाय हैं। शुध्द हवा, निर्मल जल विपुल प्रमाण में देश में अभी मुफ्त में उपलब्ध हैं। योग, प्राणायाम का यह देश गुरू रहा है इन सभी का इस्तेमाल स्वस्थ स्वास्थ्य के लिए किया जा सकता है।
महिला के स्वास्थ का परिणाम देश के स्वास्थ्य पर पडता हैं, जहाँ महिला स्वस्थ होती है वह देश में समृध्दतता स्वयं बढती है। भुखमरी और गरीबी, महिला-पुरुष के अधिकारों में समानता, माँ का स्वस्थ रहना और बिमारियों से लडने की शक्ति बढाने के प्रयास हों। पुरुषों के जीवन जीने की औसत आय 73 हैं तथा महिलाओं की 79 इस तरह वरिष्ठ नागरिकों में महिलाओं का प्रमाण अधिक हो जाता है। पहले महिलाएं केवल ग्रामीण क्षेत्र में कृषि मजदूरी करती थी अब पुरुषों के साथ शहरी क्षेत्रों में व्यवसायिक हो गई हैं। गृहस्थी के साथ इस अतिरिक्त बोझ से मानवीय तनाव भी बढ रहा है। रक्तचाप और दिल की बीमारियां महिलाओं में तेजी से बढ  रही हैं। अपेक्षाएं बढ गई हैं, सहने की शक्ति कम होते जा रही है परिणाम वे आत्महत्या करने को प्रवृत्त होती हैं। अवसाद के अन्य कई कारण और हो सकते हैं।
पानी भी एक रसायन हैं। यह रसायन अनेक बीमारियों से राहत दिलाने में अमृत का कार्य करती हैं। बालकों में 75 से 80 प्रतिशत तो महिलाओं में 50 से 60 प्रतिशत पानी रहता है। शरीर के पोषक द्रव्यों में भी इसका प्रमुख स्थान हैं। विशेष यह बहुतायत से सहज मुफ्त पाया जाता है। शरीर रूपी मशीन चलाने में इसकी अहम भूमिका हैं। जिस तरह ऑईल के बीना इंजन नहीं चलता, पानी के बीना शरीर काम नहीं कर सकता। शरीर की मशीनरी में पानी ओंगन का काम करता है, लार भोजन पचाता है, वह भी पानी से बनती है। पानी जोडों में तरलता लाता हैं, शरीर की तापमान स्थिर रखता हैं। मल बाहर फैंकने में मदद करता है। मासपेशियों को सहायता प्रदान करता है। पेशाब, पसीने के जरिये शरीर के विष को बाहर फेंकता है। केवल पानी पीने से कई बीमारियों को होने से रोका जा सकता है। पढ-लिख रही लडकियां, कामकाजी महिलाएं, सामाजिक क्षेत्र में कार्यरत महिलाएं विशेषत: पानी पीने का ध्यान नहीं रखती। उनकी भी कुछ समस्याएं हो सकती हैं किन्तु उन समस्याओं पर भारी पडेंगी, पानी न पीने की या कम पीने की समस्या। हम तो यही कहेंगे भरपूर पानी पियें, लंबा जीवन जीएं, इस बीच कोई बीमारी की समस्या आती है तो होमियोपेथी को अपनी प्रिय सहेली के रूप में देखें, साथ रखें।
वर्तमान में महिलाओं में अस्थीव्यंग वाला संधीवात अधिक देखने में आ रहा है। मोटापा भी साथ में जुड गया है। ये सभी बीमारियां बदलती लाइफ स्टाईल का परिणाम हैं। स्त्रियों में होने वाले रोगों का प्रमाण बेतहाशा बढ रहा है। अतः बहुत जरूरी है स्त्री रोग तज्ञ से समय-समय पर जांच करवाते रहना शारीरिक श्रम करने से, घुमना, व्यायाम करना, प्राणायाम, ध्यान करना जैसे प्रयोग करना जरूरी हो गया है। उसके साथ यदि होमियोपैथी जुड जाए तो सोने में सुहागा। एक बालक, एक कन्या, महिला की सबसे अच्छी दोस्त कोई बन सकती है तो उसकी क्षमता केवल होमियोपेथी में हैं। सभी बीमारियों को जड से मिटाने की क्षमता होमियोपैथी में हैं। यहां तक की महिलाओं में होने वाले कुछ कैंसर का इलाज भी। आपका भी स्वस्थ, सुखी, समृध्द हो, ताकी देश समाज सशक्त बने सके यही हमारी कामना हैं।

अपनों को हराना या उनसे हारना
दोनों ही तकलीफ....

अपनो को हराना या उनसे हारना दोनों ही तकलीफ देता है..... किसी को हराना बहुत आसान हो तब भी अतीत का ख्याल या रिश्ते के धाके बीच में आ जाते हैं..... किसी को हराने में ऊर्जा लगाने से बढ़िया है कि उसे उसकी गलती की न तो सजा दी जाए न ही माफ ही किया जाए..... कुछ सजाये बिना दिए ही चालू रहती हैं.... लोगों ने सभ्य तरीके से सजा देने के तरीके इजाद किए हैं.....दुनिया के तमाम सभ्य देशों में फांसी की सजा इसीलिए नहीं दी जाती......जबकि तालिबानी मानसिकता मौके पे सजा को मानती हैं तथा लोग उन्हें बहशी मानते हैं......क्राइम एंड पनिशमेंट ये किताब 10वीं में पढी थी, लेकिन इच्छा हो रही है कि उसको वापिस पढा जाये क्योंकि मालूम नहीं उसमें क्या लिखा था, लेकिन पढते वक्त आनंद मिला था।
धैन धरम ने क्षमा पर्व की व्यवस्था की है तथा अंग्रेजों ने सभ्यता को सबसे बढ़िया  शब्द 'सॉरी' बोलना सिखाया है..... मुसलमान इबादत के बाद अजनबी बाजू वाले से गले मिल लेते हैं......मारवाडी महासभा सनातन धरम की इस बात को आगे बढाना चाहती है कि क्षमा वीरश्य भूषणं.....हमारे देश का इतिहाश को ज्यादातर तलवार बाजी करने वालों का रहा है जबकि विकास का काम करने वाले बनिए, कलाकार या किसान जिक्र हीन रहे हैं..... ये सब बाते इसलिए लिख रहा हूं की पढे लिखे लोग मारवाडी महासभा की सामाजिक न्यायालय की कल्पना को सामाजिक पंचों को प्रकक्षित करके उन्हें पुनर्स्थापित करें ताकि वो गरिमा पूर्ण ढंग से अपनी जिम्मेवारी निभा सके तथा विवाह विच्छेद, बंटवारे, उगाही....ऐसे तमाम मसलों को आपस में सलटले ताकि देश की कचहरियों का बोझ घट सके।
मुझे आजकल ऐसे मसले निपटाने में कर्तव्यबोध का आनंद रहता है तथा जो बुजुर्ग या युवा सक्रिय हो के इस तरह के मसलों को अपनी योग्यता से निपटाने में रुचि रखते हैं उनके अनुभव का समाज को लाभ मिले इसके लिए उनसे चर्चा करके ज्ञान वर्धन भी होता है.... तिरछे पंचों ने पंच शब्द को बदनाम किया है.... उसे सुधारने में सभी को कुछ करना चाहिए क्योंकि आर्बिट्रेशन भी आजकल बहुत लम्बा होने लगा है.... जब भी कोई इस तरह की बात करे मेरे बेटे वकील लोग इसके खिलाफ में सक्रिय हो जाते हैं.... मारवाडी महासभा अपने सामाजिक न्यायपति बनाना चाहती है जो न्यायाधीश की तरह समाज के मसलों में काम कर सके..... लेकिन उसे शुरू कैसे किया जाए ये आप मुझे लिखे या सुझाएं ताकि सभी का भला हो सके... माहेश्वरी समाज में तो पंचों की कमी भी नहीं.....सभी जगह क्या लोग ऐसे वैकल्पिक सामाजिक न्यायालय शुरू नहीं कर सकते? युवाओं को इस बारे में कोशिश करनी चाहिए क्योंकि आजकल वो अपना ध्यान सेठों के स्वागत सत्कार या गैर जरूरी कामों में ज्यादा लगा रहे हैं।
महेश राठी (13 दिस.) ई-मेल

हम माहेश्वरी सचमुच माहेश्वरी कहलाने में गर्व...
सचमुच माहेश्वरी कहलाने में गर्व होता है, कहीं कोई अतिशयोक्ति नहीं है पर क्या हमारा माहेश्वरीत्व अक्षुण रहने की स्थिति में है? क्या हम भटकाव की स्थिति में नहीं आ गए हैं? हम में से कितने हैं जो समाज को सर्वोपरी समझ कर अपने क्रियाकलापों को दृष्टि देते हैं?
हम घर की बोली, घर का खाना, घरेलू शिक्षा, स्कूल से कॉलेज तक की एज्युकेशन, पहनावा, परम्परा, रिश्ते-नाते, तौर-तरीके, आपसी व्यवहार और धार्मिकता.... सबसे भटकते जा रहे हैं। जीवन के अनुशासन में हम लचीला रूख रखने की तरफ बढते जा रहे हैं। हमारी आवश्यकतानुसार नियमों में संशोधन करने के आदि हो गए हैं। बेटे-बेटी की शादी हो या माँ-बाप की सेवा हम लापरवाह होते जा रहे हैं।
अब बताइये कैसे हमारा माहेश्वरीत्व बलशाली बना रहेगा?
हाँ, हमने आर्थिक जगत में अपनी धाक जमाई है। नित नए उद्योग, व्यापार और प्रोफेशन व हमारी पैठ बनती जा रही है, रोजगारों का ढेर लगा दिया है हमने। विश्व के अनेक देशों में हमारा प्रतिनिधित्व बोलता है... हमारे माहेश्वरीत्व को चार चाँद लगाने के ये सब द्योतक हैं।
पर हमें हमारे पुरखों को भी याद रखना होगा। हमारी रीति-रिवाज को जीवित रखना होगा। हमारे साख सम्बन्धों को ताजा जल से सींचते रहना होगा। मायतों को समुचित सम्मान देकर सेवा करनी होगी। सामाजिक दृष्टिकोण से मेल-मिलाप की नीति में विश्वास रखना होगा।
और हाँ, अन्य समृध्द समाजों से सकारात्मक सीख भी लेनी होगी... हमारे समाज को भी तो दुनिया लोहा मानती हैं। हम भी उनसे उनके अपनत्व, ममत्व, एकजुटता हमारे में समाहित कर सकते हैं। अनान्य समाज भी हमारी दानशीलता की चर्चा करते नहीं थकते हैं।
मैं हृदय की गहराइयों से माहेश्वरी समाज की चहुँमुखी उन्नति की कामना करता हूँ और समाज के प्रबुध्द जनों से अपेक्षा भी करता हूँ कि अपने बहुमूल्य समय में से कुछ क्षण समाज को भी अर्पित करें ताकि हमारी अक्षुणता बनी रहे। 
जय महेश - जय माहेश्वरी

- जुगलकिशोर सोमानी

पद की मर्यादा से सदन की प्रतिष्ठा बढती है
आपको समाज के सदस्यों ने चुनकर किसी पद पर पहुंचाया, चाहे वह किसी श्रेणी का पद क्यों न हो, समाज में पद के महत्व की अपनी गरिमा होती है जिस पद पर हम चुनकर आए उस पद की प्रतिष्ठा के लिए हमें काबिज किया है। उसकी मर्यादा में रहकर हमें कार्य करना चाहिए, क्योंकि समाज बंधुओं ने आपको चुनकर समाज की सेवा के लिए उस मुकाम पर बैठाया है जहां आपको संस्था के हित में समाज सेवा करना ही उद्देश्य है। यदि सदन की गरिमा समाज बंधुओं की नजर में प्रतिष्ठित दिखाई देती है और सदन प्रगति की राह पर बढता जाता है, जिससे समाज की यह संस्था देश में नाम रोशन करती है। ऐसी ही माहेश्वरी समाज की प्रतिष्ठित संस्था अ. भा. माहेश्वरी सेवा सदन जो कि समाज के विकास में अग्रणी होकर उन्नति के रास्ते पर चली आ रही है और सदन का नाम पूरे देश में प्रसिध्द हुआ है। गत दिनों सेवा सदन के चुनाव ने पूरे देश में ख्याति प्राप्त की, जिससे समाज का हर व्यक्ति सेवा सदन के प्रति जागा है जो इस सेवा सदनों की जानकारी लेने के लिए सदन के कार्यालयों को फोन द्वारा जानकारी प्राप्त कर रहे हैं कि सेवा सदन के देशभर में कहां-कहां कितने भवन हैं और कितने कमरे बने हैं और क्या सुविधाएं हैं। इस तरह की जानकारियों के लिए अनेक शहरों से समाज बंधुओं के फोन आ रहे हैं।
ऐसी प्रतिष्ठित संस्था सेवा सदन पुष्कर जिससे समाज का कोई व्यक्ति अछूता नहीं है। इस सेवा सदन के विकास के लिए गत माह देश के समाज के बंधुओं ने पदाधिकारियों की नई टीम चुनी है, जिसका शपथ विधि का कार्यक्रम भी हो चुका है। अब सेवा सदन की नई टीम जो आपसी सामंजस्य बैठाकर काम करने की तरफ चल रही है, जिसके लिए सभी आपस में मिल जुलने के प्रयास में लगे हैं कि सेवा सदन का विकास किसी प्रकार से नहीं रूकना नहीं चाहिए। इसी तालमेल में समाज के वर्तमान अध्यक्ष  श्री श्यामसुंदर बिडला ने भ्रमण कर जानकारी प्राप्त की और अधूरे कार्य पूर्ण करने के निर्देश प्रबंधकों व स्टाफ को दिए। गत दिनों आपने हरिद्वार, वृंदावन, पुष्कर, चारभुजा गठजोड, त्रिरूपति बालाजी, गुजरात के सूरत व अहमदाबाद आदि क्षेत्रों का दौरा किया।
सेवा सदन की साख दिन-प्रतिदिन बढती रहे इसके लिए सभी को आपस में मिलकर कार्य करने होंगे, तभी पद की गरिमा व समाजसेवा का असली रूप सामने आएगा वरना आपसी खीचातानी और मनमुटाव से विकास कार्य में अवरोध पैदा होगा, जिससे समाज की क्षति होगी और समाज का विकास रूककर सदन की साख गिर जाएगी तब आपके पद की गरिमा क्या रह जाएगी? आपकी प्रतिष्ठा धूमिल हो जाएगी, इससे समाज का नुकसान होगा। इसलिए हमें आपस में एक-दूसरे को मिलकर तालमेल के साथ काम करना होगा ताकि सेवा सदन का विकास तीव्रगति से बढता जाए और देश में सेवा सदन का नाम रोशन हो।
कोर्ट कचहरी का मापदंड क्या...?
समाज का कोई भी व्यक्ति जब कोर्ट कचहरी में जाकर संस्था के विरुध्द दावा लगाता है जिससे समाज की क्षति तो होती है साथ ही संगठन में विवाद बढ जाता है परन्तु उसका निर्णय क्या होता है जिससे समय भी बर्बाद होता है और अन्त में उस विवाद का या तो आपसी समझौता होता है या दावा वापस लेते हैं। इस तरह समाज की क्षति तो होती है साथ ही मनमुटाव भी बढ जाते हैं।
इस तरह कोर्ट में कई प्रकार के प्रकरण चल रहे हैं जिनका अधिकांश निर्णय समझौते के आधार पर ही होता है। जब यह सब देखा जाता है तो हम दावे लगाने के पूर्व ही वरिष्ठजनों को बैठाकर समझौते की बात क्यों नहीं करते। जबकि आपसी सामंजस्य से विवाद निपटाए जा सकते हैं, जिससे समाज की क्षति भी नहीं होती और न किसी प्रकार का राग-द्वैष।
ऐसे लोग जो समाज को इस गर्त में पहुंचाते हैं उनसे समाज को क्या मिलता है।  समाज अपेक्षा करता है कि समाज की उन्नती हो, परन्तु ऐसे घिघोने कार्य करने वाले समाज को क्या देते हैं उनके इस कार्य से समाज के दो फाट हो जाते हैं। समाज गुटों में बंट जाता है और समाज में राजनीति चालू हो जाती है। इसके पीछे  ऐसे ही राजनीति व्यक्ति होते हैं जो आगे पीछे की नहीं सोचते और ऐसे लोग ही समाज को गर्त में धकेल देते हैं, जिससे समाज बदनाम हो जाता है और प्रतिष्ठा धूमिल हो जाती है। इसलिए हमें ऐसे घिघोने कार्य करने वालों से सचेत रहना चाहिए।


आखिर तलाक क्यों ?....


एक ओर तो आज नारी के नए नए क्षेत्रों में प्रवेश तो कर लिया है परंतु उसका जीवन निरंतर तनाव एवं पीडा से घिरता जा रहा है। विवाह जैसे मुद्दे पर तो आश्चर्यजनक एवं चौकने वाले विचार सामने आ रहे हैं। आज नारी सबसे ज्यादा चिन्तित और भयभीत है तो वह है विवाह? पहले विवाह एक सामाजिक बंधन था। विवाह प्रथा ही समाज के द्वारा, समाज और व्यक्ति के हित में बनाई गई है। माता पिता द्वारा तय किए गए विवाह का आज भी सर्वाधिक मान्यता प्राप्त है। आज भी कुल, गोत्र, जन्मकुंडली आदि देखकर ही विवाह किए जाते हैं। पूर्व में गन्धर्व विवाह, नारियों का हरण करके भी विवाह किए जाते थे।


मैं आज एक महत्वपूर्ण बिंदु पर विचार करना चाहूंगी। आज भी दहेज के कारण विवाहों में रुकावट आ रही है। तो दुसरी और तय किए हुए एवं प्रेम विवाह भी असफल हो रहे हैं। आज नारी ऐसे दोराहें पर खडी है  जहां वह यह तय नहीं कर पाक ही है कि विवाह करें भी या नहीं क़रें? कारण आज वो अपने करीअर के प्रति सजग है, वे ज्यादा पढी लिखी भी हो गई है बौध्दिक स्तर भी बढ गया है। अपने बारे में स्वयं निर्णय लेना चाहती है, यहां तक मां बाप का फैसला उसे मंजुर नहीं।


आर्थिक रूप से कुछ नारियां इतनी सक्षम है की अर्थ की चिन्ता नहीं होने से भी उन्हें विवाह की चिन्ता नहीं है। वह अपने को पंख लगाकर उडना चाहती है। डॉक्टर, इंजीनियर, साफ्टवेयर जैसे क्षेत्रों की ओर उनके कदम तेजी से बढ रहे हैं तथा वे विदेशों की ओर आकर्षित हो रही है। यहां तक तो ठीक है पर वे अपने जीवन साथी के चयन के बारे में कितनी गंभीर है यह प्रश्न विचारनीय है। उम्र बढने पर योग्य वर नहीं मिलते यदि मिलते भी है तो कभी युवक-युवती दोनों को के समाधान नहीं होता और संबंध नही हो पाते। यदि बेमेल विवाह हो जाए तो जीवन दूभर हो जाता है।


आजकल तलाक की संख्या निरंतर बढ रही है। चौतीस-पैतीस वर्ष की अवस्था में जो विवाह विच्छेद हो रहे हैं वे बहुत तनाव या असहनशीलता के कारण हो रहा है। आज की पढी-लिखी लडकी नए परिवार  में जल्दी शामिल नहीं हो पाती और पति के साथ अलग रहना चाहती है। यदि पति सहमत नहीं होता तो घर छोडने की धमकी देती है। कभी तो विवाह होते ही हो जाता है। तो कभी करसों भी लग जाते हैं। ऐसे में जीवन तनावपूर्ण हो जाता है कई मामलों में पति तो कई मामलों में पत्नी तलाक देना नहीं चाहती ऐसे में वे अलग-अलग रहने लगते हैं और उससे बच्चों पर गलत प्रभाव पडता है।


तलाक किसी भी कारण हो यह है तो एक दुःखद घटना ही। फिर भी सबसे महत्वपूर्ण कारण सहनशीलता  कि कमी होना और नासमझी ही है। पुरुष और स्त्री दोनों को ही यह समझ लेना चाहिए इसका परिणाम दोनों को ही भुगतना पडता है। यदी बच्चें है तो इसका परिणाम उन पर सबसे ज्यादा होता है कारण कभी बच्चें मां के पास तो कभी बच्चें पिता के पास। इसमें लिए हमें एक छत के नीचे बैठकर अपना समझौता करना होगा। हमे कोर्ट में जो सच्चे झूठे इल्जाम लगाकर अपमानित किया जाता है वह बडा शर्मनाक होता है। फिल्मों एवं टी.वी. सिरियलों के  माध्यम से जो कुछ भी बताया जा रहा है तलाक का कारण उनमे से एक है तलाक सुदा महिला सुरक्षित जीवन नहीं जी पाती है।


निरंतर बढते तलाक, टूटते परिवारों के बारे में हमे कुछ तो सोचना ही होगा। आखिर स्त्री पुरुष की एसी क्या लाचारी है जो उन्हें तलाक तक ले आती है। कई तलाकों में माता-पिता भी प्रोत्साहन देते हैं। बडे घर की लडकियां विवाह पश्चात ऐडजेस्ट नही हो पाती और माता-पिता के घर लौट आती है और मां बाप भी सहानुभूति दिखा कर रोक लेते हैं परंतु बाद में उन्हें यह बहुत भारी पडता है। तलाकशुदा औरत का अकेले रहना तो दुभर हो ही जाता है फिर यदि वह पुनर्विवाह कर भी ले तो यह धब्बा कभी नहीं मिटता साथ ही इसकी भी क्या गारंटी की वो दुसरी शादी में सुखी रह सकेंगी।


इसीलिए परिवार परामर्श समिति खोली गई है जो परिवार टूटने से बचाया जा सके। माता-पिता को चाहिए बचपन से ही बालिकाओं को सहनशीलता का पाठ पढाएं शिक्षित होकर नारी को गर्विष्ट नहीं होना चाहिए। घर में प्रवेश करते ही भूल जाना चाहिए कि वह नौकरी पेशा नही केवल एक गृहणी है। आपने अहं निकाल फेंकना चाहिए तथा पतिने परिवार का सम्मान करना चाहिए। ऐसा ही सुसराल पक्ष को भी करना चाहिए। 

 - राजकुमारी कोठारी, औरंगाबाद (महाराष्ट्र)

सफलता की सीढी
जिसने भी समय के महत्व को समझा है और खुद को समय के साथ-साथ अनुशासित किया है, उसने अपनी कामयाबी सुनिश्चित कर ली है। यदि हम अपना समय सुनियोजित तरीके से गुजारें और लक्ष्य की ओर लगन से आगे बढते रहें, तो वह दिन दूर नहीं होगा, जब मंजिल हमारे सामने होगी। बहुत से व्यक्ति भूत और भविष्य की चिंता में अपने वर्तमान को ही बर्बाद करते रहते हैं। वे कुछ करना तो चाहते हैं, परन्तु क्या किया जाए, कैसे किया जाए, कब से किया जाए? आदि ऐसी ही चिंताओं से परेशान होकर अपना ज्यादातर समय गंवा देते हैं और तब तक बहुत वक्त निकल जाता है।

किसी भी मकसद में कामयाब होने की पहली शर्त है आप नियमित दिनचर्या अपनाएं। हर काम समय पर करें, बेकार में समय बर्बाद न करें। आइंस्टीन ने कहा है 'समय ही मनुष्य का निर्माता है। सभी कामयाब व्यक्तियों ने समय की महत्ता को समझा है और यदि आप भी कामयाब व्यक्ति बनना चाहते हैं तो समय के साथ चलें। बडे-बडे आविष्कारक नाकामी का सामना करना पडा है, परन्तु फिर भी वे निराश नहीं हुए बल्कि अपने काम में लगन से जुट कर प्रयास करते रहे और आखिर में उन्हें कामयाबी मिली। निराश व्यक्ति जरा सी भी परेशानी आने पर घबरा जाता है और काम छोड कर क्या करे, क्या न करे की उधेडबुन में फंस जाता है, जबकि आशावादी व्यक्ति हमेशा प्रयास करता रहता है और लक्ष्य पाकर ही दम लेता है। कहा भी है कि जो व्यक्ति अपनी धुन के पक्के होते हैं वे अपनी मंजिल पा लेते हैं।
'मन के हारे हार है और मन के जीते जीत' के मुताबिक मन में आशा की ज्योति जला कर रखने से ही काम आसान बनता है, जिन्होंने आशा के बल पर अपना लक्ष्य पूरा किया और बहुत ही कठिन कामों को भी इसी तरह निरन्तर जुट कर ही अंजाम दिया गया, चाहे वह एवरेस्ट विजय हो या चंद्रमा पर उतरना। सतत प्रयासों के बल पर अपने लक्ष्य पाए हैं, तो आप क्यों नहीं पा सकते? बस, आज से ही और अभी से ही आप को मजबूत संकल्प लेने की जरूरत है और साथ ही जरूरत है आप की निरन्तर साधना की। व्यक्ति की मेहनत की कामयाबी हासिल करने का एक मूलमंत्र है, जो जीवन की आधारशिला भी है। हमारे 2 हाथ और 2 पैर मेहनत करने के लिए ही हैं। जो यक्ति एक पल भी बेकार जाने देते हैं, वह अपने विवेक और ज्ञान के खजाने का अपमान करते हं। इससे व्यक्ति का ही नहीं बल्कि राष्ट्र का भी अहित होता है। मेहनत के जरिए हम अपनी और समाज की उन्नति और कल्याण कर सकते हैं। चाहे वह दिमागी मेहनत हो या शारीरिक मेहनत कर सकते हैं। इतिहास गवाह है कि हमने मेहनत के बल पर क्या से क्या करके ही दिखाया है। साहसी और मेहनती व्यक्ति हर क्षेत्र में कामयाब होते हैं।
स्वावलंबन यानी खुद पर भरोसा करना भी कामयाबी का मूल आधार है। 'स्व' का अर्थ है अपना खुद का और आवलंबन का अर्थ है सहारा लेना यानी आत्मनिर्भरता। इसका जीवन में अधिक महत्व है। जीवन में केवल वही व्यक्ति कामयाब होते हं, जो स्वावलंबी होते हैं। स्वावलंबी व्यक्ति सामने संसार की सारी बाधाएं सिर झुकाती हैं। स्वावलंबन से ही आत्मविश्वास और आत्मसम्मान पैदा होता है, जिससे उसके व्यक्तित्व का विकास होता है और समाज में भी केवल ऐसा ही व्यक्ति आदर पाता है। इसके विपरीत जो व्यक्ति हर काम के लिए औरों का मुंह ताकता है, जो किसी के सहारे की अपेक्षा में बैठा रहता है वह जीवन में कभी भी कामयाब नहीं हो पाता है। उसे खुद पर भरोसा नहीं होता है और हर काम में उसे रुकावटें ही नजर आती है। मानसिक नजरिए से वह बौना रह जाता है। समाज में उसका आदर तो नहीं हो पाता, बल्कि वह खुद पर, समाज और देश पर भी बोझ के समान होता है। लिहाजा, कामयाब होने के लिए स्वावलंबी बनें और अपनी हर समस्याओं और मुश्किलों से खुद जूझ कर अपनी मंजिलें तय करें। स्वावलंबी बनकर व्यक्ति जीवन में कामयाब होने का मूलमंत्र और सम्मान से जीने की कुंजी पा सकता है। आने वाली मुश्किलों पर विजय हासिल करने वाले व्यक्ति ही कामयाब होते हैं और इस में आधार बनती है, अनुशासन की भावना। प्राचीन काल में आश्रमों में ॠषिमहर्षि अपने शिष्यों को पढा कर विद्वान बनाने के बाद जीवन में हमेशा अनुशासित रहने पर जोर देते थे। वे जानते थे कि अनुशासित व्यक्ति ही किसी दूसरे के अनुभवों से लाभ उठाता है। महात्मा गांधी, सुभाषचंद्र बोस, राणा प्रताप और शिवाजी ने अनुशासन का पालन कर अंग्रेजी शासन की नींव हिला दी। नेपोलियन समुद्रगुप्त, सिकंदर आदि महान सेनानायकों की लगातार विजय का रहस्य उनकी सेनाओं का अनुशासित होना ही था। नौजवानों के लिए तो अनुशासन बहुत जरूर और अनिवार्य है, क्योंकि वही देश का भविष्य होते हैं, इसलिए जीवन में कामयाबी हासिल करने के प्रमुख सूत्र, अनुशासन, स्वावलंबन और मेहनत तो है ही साथ ही हमें अपना लक्ष्य तय कर समय के साथ उसे हासिल करने के लिए निरन्तर प्रयास करते रहना चाहिए। फिर देखिए, कामयाबी आपके कदमों को चूमेगी। हम लक्ष्य को निश्चित कर और अपने मन को एकाग्र करके साहस से अपने काम में लगे रहें।
- मोहनलाल मंत्री


 

ई-मेल रजिस्टर करें

अपनी बात
मतभेद के बीच मनभेद न आने दें...।

मतभेद के बीच मनभेद न आने दें...।