सफलता दिलाते है श्री गणेशजी

सफलता दिलाते है श्री गणेशजी
जो व्यक्ति छात्रकाल में, विवाह के समय, नगर में या नवनिर्मित भवन में प्रवेश करते समय, यात्रादि के अवसर पर या विपत्ति के समय श्रीगणेशजी के बारह नामों का स्मरण करता है, उसे उद्देश्यपूर्ति में किसी विघ्न का सामना नहीं करना पडता।

भगवान श्रीगणेश का नाम ऐसा पावन उच्चारण है, जिससे स्वतः ही सर्वत्र मंगलमयता प्रतीत होने लगती है। श्रीगणेश साक्षात परब्रह्म परमात्मा हैं। वह साधारण देवता नहीं, अपितु अनंतकोटि ब्रह्माण्डनायक जगन्नियंता ब्रह्म ही है।
इन्हें प्रसन्न किए बिना कल्याण संभव नहीं है। इनकी पूजा-अर्चना, उपासना न केवल हमारे जीवन की सभी बाधाओं तथा मुश्किलों को मूल सहित दूर फेंक देती है, अपितु  हमें सद््बुध्दि, रिध्दि-सिध्दि तथा सत्य के मार्ग पर अग्रसर भी करती है। श्रीगणेश शक्ति और शिवतत्व का साकार स्वरूप है। इन दोनों तत्वों का सुखद स्वरूप ही किसी कार्य में पूर्णता ला सकता है। गणेश शब्द की व्याख्या अत्यंत महत्वपूर्ण है। गणेश का 'ग' मन के द्वार, बुध्दि के द्वारा ग्रहण करने योग्य, वर्णन करने योग्य सम्पूर्ण जगत को स्पष्ट करता है। 'ण' मन, बुध्दि और वाणी से परे ब्रह्म विद्यास्वरूप परमात्मा को स्पष्ट करता है और इन दोनों के ईश अर्थात स्वामी गणेश कहे गए हैं। गणपति शब्द ब्रह्म अर्थात् ऊँ के प्रतीक हैं। श्रीगणपत्यर्वशषि में कहा गया है कि ऊँ का ही व्यक्त स्वरूप गणेश देवता है, जिस प्रकार प्रत्येक मंत्र के आरंभ ऊँ का उच्चारण आवश्यक है, उसी प्रकार प्रत्येक शुभ अवसर पर देवों में अग्रपूज्य रभगवान गणपति की पूजा एवं स्मरण अनिवार्य है। गणपति की उत्पत्ति और उनका गणनायक बनना संयोगवश एक ही दिन हुआ है। गणेश को बुध्दि का देवता माना जाता है। शिव पार्वती के लाडले गणेश सदा अपना माता-पिता का वंदन तथा सत्कार करते आए हैं। शिवपुराणा में स्वयं शिवजी ने उन्हें विघ्न नाशक होने का वर दिया- हे गणेश्वर! तू भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को चंद्रमा का शुभोदय होने पर उत्पन्न हुआ था परन्तु दैव योग से वापस भाद्रपद शुक्ल पक्ष चतुर्थी को मेरी प्रसन्नता से पुत्र रूप में गणाध्यक्ष बना है। अतः मैं वर देता हूं कि इस भाद्रपद पर शुक्ल चतुर्थी को जो तुम्हारा व्रत करेगा, उस पर आने वाले मिथ्या कलंक आदि सब दूर हो जाएंगे। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से चतुदर्शी तक दस दिन जो कोई तुम्हारी जयंती का उत्सव मनाएगा, वह परम सुखी होगा। शोक में डूबे हुए को यही व्रत शोकरहित करेगा। कलयुग में चंडी तथा विनायक ही शीघ्र फलदाता माने गए हैं। भगवान गणेश की शारीरित बनावट के मुकाबले उनका वाहन काफी छोटा चूहा है। चूहे का काम किसी चीज को कुतर डालना है। वह चीर-फाडकर उसके प्रत्येक अंग-प्रत्यंग का विश्लेषण कर देता है। गणेश बुध्दि और विद्या के अधिष्टाता हैं। तर्क-वितर्क में उनका कोई सानी नहीं है। इसी प्रकार मूषक भी तर्क-वितर्क में पीछे नहीं है। काट-छांट में उसका कोई सानी नहीं है। इसलिए उसके इन्हीं गुणों को देखकर उन्होंने उसे अपना वाहन चुना। गणेशजी की सूंड हमेशा हिलती-डुलती रहती है, जो उनके सचेत होने का संकेत है। इसके संचालन से दुख-दारिद्रय समाप्त हो जाते हैं। अनिष्टकारी शक्तियां डरकर भाग जाती है। यह सूंड बडे-बडे दिगपालों को भयभीत करती है, वही देवों का मनोरंजन भी करती है। मान्यता है कि सुख समृध्दि हेतु उनकी दाईं और मुडी हुई सूंड की पूजा करनी चाहिए। वहीं शत्रु को परास्त करने या ऐश्वर्य पाने के लिए बाईं ओर मुडी हुई सूंड की पूजा करनी चाहिए। गणेशजी का पेट बहुत बडा है। इसी कारण इनको लम्बोदर भी कहा जाता है। वह हर अच्छी और बुरी बाते को पचा जाते हैं और हर बार का निर्णय तुरंत और सूझबूझ के साथ लेते हैं। ऐसा भी माना जाता है कि उनका पेट विभिन्न विद्याओं का कोप है। वह लम्बे कान वाले हैं, अतः उन्हें गजकर्ण भी कहा जाता है। लम्बे कान वाले भाग्यशाली होते हैं। लम्बे कानों का एक रहस्य यह है कि वह सबकी सुनते हैं पर अपनी बुध्दि से ही क्रियान्वयन करते हैं। उनका एक ही दांत होने के कारण वह चबाने वाली चीजें नहीं खा पाते होंगे। लड्डू खाने में आसानी होती होगी इसलिए मोदक उन्हें प्रिय है क्योंकि वह आनंद का भी प्रतीक है। वह ब्रह्म शक्ति का प्रतीक है क्योंकि मोदक बन जाने के बाद उसके भीतर क्या है, दिखाई नहीं देता। मोदक की गोल आकृति गोप और महाशून्य का प्रतीक है। शून्य से सब उत्पन्न होता है और शून्य में सब विलीन हो जाता है। भगवान परशुराम से युध्द में उनका दांत टूट गया था। उन्होंने अपने टूटे दांत की लेखनी बनाकर महाभारत का ग्रंथ लिखा। उनके हाथ में पाश है जो राग, मोह और तमोगुण का प्रतीक है। इसे वह अपने हाथ में धारण करते हैं। यह तेज धार का होता हो तर्कशास्त्र का प्रतीक है।

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